Thursday, 15 December 2016

शहर से गांव की और

शहर से गांव की और
कितना अल्हड़ जीवन था बचपन का। न कोई टारगेट, न कोई काॅम्पिटशन, खाया पीया मस्त। खेलना दिनभर, छोटे छोटे झगड़े, रूठना, आसानी से फिर मान भी जाना। ये अपने गांवो में ही था। खुला वातावरण, शुद्ध ताजा हवा, शुद्ध खाना सब गांंवो में मिलता था। शाम को जब खेतों से ढोर, पशुओं के साथ लौटते तो उनके पैरों से धुएं का गुब्बार सा बन जाता था। वह गुब्बार आसमान में छा जाता और उससे मिट्टी की सौंधी खुशबु आती, बड़ा अच्छा लगता था। मजे कि बात कोई एलर्जी, कोई बिमारी नही होती थी। इसके पीच्छे कारण यह था कि, शुद्ध देशी खान पान से इम्युनिटी पावर इतना बढ़ जाता था की कोई रोग पास नही फटकता था। शाम को चिमन्नी (काँच की छोटी बोतल में कपड़े की बत्ती बनाकर ढक्कन में छेद कर के थोड़ा सा बाहर निकालकर मिट्टी का तैल भरकर रखते थे) की रोशनी में चुल्हे पर बनते हुए खाना देखने का आनंद ही कुछ और था। काश वो बचपन लौटा दे कोई। शहर की आपा धापी से दूर शांत चाँदनी रातों का मज्जा आज भी गुदगुदा जाता है।

राजेश भास्कर
9680615806